Tuesday, 20 November 2018, 5:52 AM

कविता

चुनरी हरी उढानी है

Updated on 19 August, 2018, 7:00
विवेक रंजन श्रीवास्तव रोप पोस कर पौधे, अनगिन हरे भरे  अपनी जमीं को चूनर, हरी ओढ़ानी है होंगे संकल्प सारे हमारे फलीभूत हम प्रयास तो करें, सफलता आनी है  जब खरीदा, इक सिलेंडर आक्सीजन  तब  वृक्षों की कीमत उसने जानी है  जहाँ अंकुरण बीजों का है  संभव  ब्रम्हाण्ड में सारे , धरा यही वरदानी है  घाटियां गहराईयां , ऊँचाईयां... आगे पढ़े

वक्त बहुत गुजारा मैनें...

Updated on 20 April, 2017, 23:45
वक्त बहुत गुजारा मैनें, खो दिया वो समय कुछ ही क्षण मे| वक्त का कैहर देखो  मुझपर क्षण क्षण भारी सा है शहर में | खुली किताब न ज़िंदगी की पृष्ठ रंग देखा हर क्षण, वक्त भी सलाह करता नही किसी से बदल गया एक क्षण में | मुठ्ठी मे बंदकर समय रखा था,... आगे पढ़े

ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है,

Updated on 27 August, 2016, 20:37
ये सितारों से भरा आसमा इतना खमोश क्यों है, ये चाँद सा चेहरा इतना खमोश क्यों है । तेरी चँचलता दिखती है मुझे तेरी आँखों मे, तेरी नादानियाँ दिखती है मुझे तेरी बातों में। तू हँसती है खिलखिला कर, लेकिन तेरा मन इतना खमोश क्यों है। क्या हुनर है तुझमें खुद का गम छुपाकर औरों... आगे पढ़े

"हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!!

Updated on 9 August, 2016, 10:29
एक ट्रक के पीछे लिखी ये पंक्ति झकझोर गई...!! "हाॅर्न धीरे बजाओ मेरा 'देश' सो रहा है"...!!! उस पर एक कविता इस प्रकार है कि..... 'अँग्रेजों' के जुल्म सितम से...   फूट फूटकर 'रोया' है...!! 'धीरे' हाॅर्न बजा रे पगले....     'देश' हमारा सोया है...!! आजादी संग 'चैन' मिला है... 'पूरी' नींद से सोने दे...!! जगह मिले वहाँ 'साइड' ले ले... हो 'दुर्घटना'... आगे पढ़े

शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ

Updated on 8 July, 2016, 18:51
शिकायत करूँ तुझसे या तेरा शुक्रिया करूँ। कभी आसमां दिखा देता है,और कभी जमी पर गिरा देता है। अकसर ये तेरी इनायत का तुफान मुझे,किनारे से मजधार पर ला देता है। कभी छमछम करती बारिश तन को भिगा जाती है, तो कभी चिलचिलाती धूप से मन को जला देता है। अकसर ये तेरी इनायत का... आगे पढ़े