रायपुर। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा ध्यान अधोसंरचना के विकास और खासकर हाइवे के उन्न्यन पर दिया। पीएम मोदी दावा करते रहे कि पहले जितनी सड़क एक महीने में बनती थी उतनी अब एक दिन में बन रही है। छत्तीसगढ़ में दो दशक के बाद प्रमुख हाइवे का उन्न्यन किया गया है।

रायपुर से जगदलपुर और रायपुर-बिलासपुर सड़क पर काम हो रहा है। पहले चरण में धुर नक्सल प्रभावित बस्तर में चुनाव हैं। बस्तर रेलमार्ग से सीधा नहीं जुड़ा है। यहां हवाई सेवा शुरू करने की कोशिशें भी अब तक परवान नहीं चढ़ पाई हैं। रायपुर को जगदलपुर से जोड़ने वाला हाइवे 30 बस्तर की लाइफ लाइन है। इसी लाइफ लाइन के दोनों किनारों पर विकास दिखता है जबकि अंदरूनी गांव आज भी आदिम युग की झलक देते हैं।
रायपुर से जगदलपुर तक सड़क खराब होने की वजह से पहले इस सफर से सात से आठ घंटे लगते थे। अब धमतरी के आगे बस्तर तक हाइवे बन चुका है और सफर चार से पांच घंटे का हो गया है। छत्तीसगढ़ की पहली कांग्रेस सरकार ने 2001 में जगदलपुर से बीजापुर जिले के भोपालपटनम तक हाइवे का निर्माण का काम बार्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) को दिया था। नक्सल समस्या की वजह से काम लगातार पिछड़ता रहा।

जगदलपुर से गीदम तक बीआरओ ने सड़क बना दी। इसके आगे धुर नक्सल इलाके में कहीं मिट्टी का काम किया तो कहीं पुलिया का। फिर बाकी काम अधूरा रह गया। इस सड़क को अब बना लिया गया है। जगदलपुर से सुकमा तक सड़क पहले ठीक की गई थी।
शहादत के बाद बनी सड़कें
बस्तर में 12 सौ किमी सड़कें बनी हैं। इन सड़कों के निर्माण में नक्सलियों से लड़ते हुए कई जवानों ने शहादत भी दी है। 2017 में कांकेर लंका में पुलिया निर्माण की सुरक्षा में लगे जवानों पर नक्सलियों ने हमला किया था जिसमें 25 जवान शहीद हुए थे। तमाम अवरोधों के बाद भी भाजपा सरकार सड़कों के रास्ते विकास पहुंचाने की कोशिशों में जुटी रही।

सड़क से दूर बसे गांव अंधेरे में
दंतेवाड़ा, नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर जिलों में सड़क के भीतर बसे गांवों तक विकास नहीं पहुंच पा रहा है। कोंडगांव और बस्तर जिले में भी कई गांव ऐसे हैं जहां बिजली नहीं पहुंचाई जा सकी है। अबूझमाड़ का 44 सौ वर्ग किमी का इलाका तो ऐसा है जहां न सड़क है, न बिजली न पानी। विकास की यह असमानता बस्तर को देश के दूसरे इलाकों से अलग करती है।

चुनाव प्रचार भी सीमित दायरे में
बस्तर में चुनाव प्रचार भी आमतौर पर सड़कों और मुख्य शहरों के आसपास बसे गांवों तक सिमटा रहता है। अंदरूनी गांवों मंे प्रत्याशी और उनके समर्थक जा ही नहीं पाते। चुनाव प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं की कई बार नक्सली हत्या कर चुके हैं। विकास की बात सड़कों के किनारे ही हो रही है। अंदर तो नक्सलवाद और जंगल हैं। यहां पिछड़ापन भी मुद्दा नहीं बनता क्योंकि यहां के आदिवासी भी प्रशासन और सरकार तक नहीं पहुंच पाते।