इन्दौर । रेसकोर्स रोड़ स्थित खेल प्रशाल परिसर आज सुबह जैन समाज के दो वरिष्ठ आचार्यों के आत्मीय मिलन का साक्षी भी बना और हजारों समाज बंधुओं की मौजूदगी में श्वेतांबर, दिगंबर एवं तेरापंथी जैन समाजों के बीच एकता, सदभाव एवं रिश्तों की प्रगाढ़ता की नई पहल की इबारत लिखने वाला ऐतिहासिक समारोह भी बन गया। श्वेतांबर जैन समाज के राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्यदेव रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. एवं दिगंबर जैन समाज के आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर म.सा. इस मौके पर एक दूसरे से आत्मीयता के साथ मिले और दोनो ने कहा कि दिगंबर, श्वेतांबर और तेरापंथी आदि एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखाएं है और सभी एक ही वृक्ष से जुडे होने के कारण सबकी जड़े भी एक ही है। अवसर और समय आया तो हम दोनों एक साथ चातुर्मास करने के लिए भी तैयार हैं। हम सर्वश्रेष्ठ जैन कुल में जन्मे हैं, तो हमारा आचरण भी उसी के अनुरूप मर्यादित और गरिमापूर्ण होना चाहिए। निम्न कोटि का व्यवहार और आचरण कर हमें अपने कुल की मर्यादा को कलंकित नहीं करना चाहिए। हमारी मान्यताएं भले ही अलग हों, मंदिर के बाहर हम जब भी मिलें, सिर्फ और सिर्फ जैन रहें। हजारों समाज बंधुओं ने करतल ध्वनि के साथ आचार्यों के इस मंतव्य का खुले मन से स्वागत किया।    
खेल प्रशाल की सभी गेलरियां और सभागृह आज शहर के जैन समाज के बंधुओं से लबालब भरी रहीं। आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर म.सा. ने अपने अनुष्ठान में राष्ट्रसंत रत्नसुदंर म.सा. को विशेष रूप से आमंत्रित किया था। इस आमंत्रण को स्वीकार कर आचार्य रत्नसुदंर म.सा. साधु-साध्वी भगवंतो सहित खेल प्रशाल पहुंचे जहां हजारों समाज बंधुओं द्वारा महावीर स्वामी एवं जिनशासन के जयघोष के बीच दोनों संतो का आत्मीय मिलन हुआ। इस भावपूर्ण प्रसंग के साक्षी बने अनेक समाज बंधुओं की आंखे नम हो गई। दिगंबर, श्वेतांबर और तेरापंथी जैन समाज के लगभग सभी वरिष्ठ पदाधिकारी खेल प्रशाल में उपस्थित थे। आचार्य रत्नसुंदर म.सा. ने अपने आशीर्वचन में कहा कि पाप, ताप और संताप गुरू के चरणों में बैठने से समाप्त हो जाते हैं। हम पर दुख और कष्ट इसलिए आते हैं कि हम सुख के समय में परमात्मा को याद नहीं करते। जीवन में यदि हम अपनी लाईन ऑफ कंट्रोल का निर्धारण कर ले और अपनी भाषा, स्वतंत्रता, जरूरतों और भावनाओं पर नियंत्रण कर ले तो जीवन को धन्य बनाने की दिशा में यह बहुत बड़ा कदम होगा। आचार्यश्री ने इसके लिए कंट्रोल ऑफ लेंग्वेज, कंट्रोल ऑफ इंडिपेंडेंस, कंट्रोल योर नीड्स और कंट्रोल ऑफ इमोशंस जैसे चार सूत्रों की प्रभावी व्याख्या भी की। उन्होने कहा कि आज जरूरत इस बात है कि जैसे परिवार में बेटे या भाईयों के बीच विरोध, विभाजन और विवाद को खत्म कर संवाद का पर्यावरण बनाया जाता है उसी तरह जैन समाज के विभिन्न घटकों को भी यह समझ लेना चाहिए कि हम सब एक ही वृक्ष की शाखाएं है और हमारी जड़े भी एक ही है इसलिए समय के अनुसार सबको मिल जुलकर रहना चाहिए।  
दिगंबर जैन आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर म.सा. ने कहा कि सुनना महत्वपूर्ण नहीं है, चुनना महत्वपूर्ण है। हम जीवन में इन संदेशों  को कितना उतारते हैं, यह हम पर निर्भर है। हम सर्वश्रेष्ठ कुल में जन्मे हैं तो हमारा आचरण भी सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। निम्न कोटि का आचरण और व्यवहार अपने कुल की मर्यादा को कलंकित बना देता है, इसलिए ऐसा कोई आचरण नहीं करें। श्वेतांबर, दिगंबर और तेरापंथी आदि के रूप में हमारी मान्यताएं भले ही अलग अलग हो, मंदिर के बाहर आते ही हम सिर्फ और सिर्फ जैन बने रहे।
इस अवसर पर आचार्य रत्नसुदंर म.सा. ने आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर म.सा. द्वारा उन्हे अपनी ही प्रवचन सभा में आमंत्रित करने की उदारता कि दिल खोल कर प्रशंसा की। वहीं प्रसन्नचंद्र सागर म.सा. ने भी आचार्यश्री की सरलता और विद्वता की तारीफ करते हुए कहा कि आपके प्रवचन के एक एक शब्द में गूढ़ संदेश छिपा होता है, आपकी कही हुई हर बात आज के समाज में व्याप्त बुराईयों पर प्रहार करने वाली होती है। उन्होने उपस्थित जैन बंधुओं का आव्हान किया कि वे आचार्यश्री रत्नसुदंर म.सा. के प्रवचन नियमित रूप से सुने और उन्हे जीवन में उतारने का प्रयास करें। प्रारंभ में श्वेतांबर जैन समाज के कल्पक गांधी, कीर्तिभाई डोसी, यशवंत जैन, दिलीप सी जैन, रूपेश शाह, आशीष शाह, देवाशीष कोठारी, हेमंत जैन तथा दिगंबर जैन समाज के डी.के. जैन, जैनेश झांजरी, डॉ. संजय जैन, विमल सोगानी, सुरेंद्र जैन बाकलीवाल, महावीर पाटनी आदि ने सभी समाजबंधुओं एवं आचार्यों की अगवानी की। भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, सांसद शंकर लालवानी एवं विधायक रमेश मेंदोला भी इस समारोह में उपस्थित थे और उन्होंने भी आचार्यद्वय से शुभाशीष प्राप्त किए। कृष्णागिरी तीर्थ के पीठाधीपति यतिवर्य डॉ. वसंत विजय महाराज ने भी आज रेसकोर्स रोड स्थित उपाश्रय पहुंचकर आचार्य श्री रत्नसुंदर म.सा. से आशीर्वाद प्राप्त किए। संचालन डॉ. संजय जैन ने किया।