नई दिल्ली: आखिर वही हुआ, जिसका डर था. टीम इंडिया आईसीसी विश्व कप में खिताब के बेहद करीब पहुंचकर भी खाली हाथ रही. वैसे, यह पहली बार नहीं है, जब हम विश्व कप से खाली हाथ लौट रहे हैं. यह जरूर पहली बार है कि जब नंबर-1 टीम, नंबर-1 बैट्समैन, नंबर-1 बॉलर सबकुछ हमारे हैं. फिर भी हम हार का गम गलत कर रहे हैं. अब समीक्षाओं का दौर चलेगा. कोचिंग स्टाफ पर गाज गिरेगी. लेकिन हार की सबसे बड़ी वजह की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले. वो वजह, जिसका अंदाजा सबको था. जिसे सुलझाने की बजाय लगातार उलझाया गया और इसमें कोच रवि शास्त्री, कप्तान विराट कोहली और चयनकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया. 

बात हो रही है टीम इंडिया के उस नंबर-4 की, जिसके बारे में क्रिकेटप्रेमियों को तो छोड़िए, इस नंबर पर खेलने वाले खिलाड़ी को भी पता नहीं रहता है कि वह अगले कितने मैच खेलेगा. जबरिया पैदा की गई इस समस्या का नतीजा यह रहा कि विश्व कप में हमारा नंबर-4 का एक भी बल्लेबाज अर्धशतक तक नहीं बना सका.


विश्व कप के नौ मैचों में हमने नंबर-4 पर चार बल्लेबाजों को आजमाया. सबसे पहले केएल राहुल, फिर विजय शंकर, ऋषभ पंत और हार्दिक पांड्या. इनमें से पांड्या को फ्लेक्सिबिलिटी के नाम पर अलग भी कर दें तो एक ही टूर्नामेंट में एक ही नंबर पर तीन बल्लेबाज... 
बल्लेबाजी में नंबर-4 को टीम की रीढ़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. यह वो नंबर है, जो शुरुआती झटके लगने पर टीम को संभालता है और अच्छी शुरुआत मिलने पर बड़े स्कोर तक ले जाता है. मौजूदा विश्व कप के सेमीफाइनल में पहुंची चार में से तीन टीमों के पास नंबर-4 पर ऐसे ही दमदार खिलाड़ी हैं. आप वेस्टइंडीज के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया के नंबर-4 स्टीवन स्मिथ की मैच जिताने वाली पारी नहीं भूले होंगे. न्यूजीलैंड के नंबर-4 रॉस टेलर की बैटिंग सेमीफाइनल में भारत की हार की बड़ी वजह रही. वे इस विश्व कप में तीन फिफ्टी लगा चुके हैं. इंग्लैंड के नंबर-4 तो उसके कप्तान इयोन मोर्गन ही हैं, जिन्होंने इसी वर्ल्ड कप में एक ही पारी में 17 छक्के जड़ दिए थे.