जय गणेश गणाधिपति प्रभु , सिध्दिदायक , गजवदन
विघ्ननाशक कष्टहारी हे परम आनन्दधन ।।
दुखो से संतप्त अतिशय त्रस्त यह संसार है
धरा पर नित बढ़ रहा दुखदायियो का भार है ।
हर हृदय में वेदना , आतंक का अंधियार है
उठ गया दुनिया से जैसे मन का ममता प्यार है ।।
दीजिये सदबुद्धि का वरदान हे करूणा अयन ।।१।।

प्रकृति ने करके कृपा जो दिये सबको दान थे
आदमी ने नष्ट कर ड़ाले हैं वे अज्ञान से 

प्रगति तो की बहुत अब तक विश्व में विज्ञान से 

प्रदूषित जल थल गगन पर हो गए अभियान से

 फंस गया है उलझनो के बीच मन हे सुख सदन


 प्रेरणा देते हृदय को प्रभु तुमही सद्भाव की

 दूर करके भ्रांतियां सब व्यर्थ के टकराव की

 बढ़ रही जो सब तरफ हैं वृत्तियां अपराध की

 रौंद डाली है उन्होंने फसल सात्विक साध की

 चेतना दो प्रभु की उन्माद से उधरे नयन