अपनी दास्तां सुनाते-सुनाते रो पड़े ब्रजेश पाठक
मेरठ|यूपी के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक अपने बीते दिनों को याद कर इतने ज्यादा भावुक हो गए कि मंच पर ही फफक कर रोने लगे। आंखों से गिरते आंसुओं को भी चाह कर नहीं रोक सके। वाक्का मेरठ में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में हुआ। उन्होंने कहाकि जब भी मैं सड़क पर किसी गरीब को परेशान देखता हूं तो दुखी हो जाता हूं। इस दौरान लखनऊ आने से पहले की दास्तां को सुनाया। बताया कि किस तरह संघर्ष करते हुए यहां तक पहुंचे हैं।ब्रजेश पाठक ने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्हें कभी जाड़े के लिए जूते नहीं होते थे तो कभी चप्पल नहीं मिलती थी। बताया कि जब बाबा साहेब को सुना तो उनके अंदर पिता की छवि दिखी, मेरे पिता जी जीवित नहीं थे इसलिए मैंने उन्हें पिता समान माना। खुद को गरीबों का सेवक बताते हुए उन्होंने कहा कि वे गरीबी का दर्द अच्छी तरह समझते हैं क्योंकि उन्होंने इसे खुद इसे जिया है।
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उन्होंने बताया कि जब वह लखनऊ आ रहे थे तो उनकी अम्मा ने एक स्टोव दिया था। उसी पर वह खाना बनाते थे लेकिन उन्हें ठीक से खाना बनाना भी नहीं आता था। कभी आटे में पानी ज्यादा हो जाता तो कभी आटा बहुत ज्यादा गूथ देता था, जबकि अकेले ही खाना रहता था। उन्होंने कहा कि बड़े संघर्ष के बाद वह इस मुकाम पर पहुंचे हैं। कहा कि आज जहां खड़ा हूं, उसके लायक भी अपने को नहीं समझता हूं। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि आज वह जिस मुकाम पर हैं वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने बेहद अभाव और गरीबी का सामना किया है। इसी दौरान बेहद भावुक हो गए। उनके शब्द गले में ही रुक गए और मंच पर ही रोने लगे। आंखों से आंसू बहने लगे। चश्मा ऊपर कर अपने आंसुओं को पोछा और संबोधन को किसी तरह पूरा किया।


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