कृष्णा-गोदावरी गैस केस: लंबी कानूनी लड़ाई से बचने की कोशिश
नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट कानूनी लड़ाइयों में से एक, कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन गैस माइग्रेशन विवाद में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक नया मोड़ आया। रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और उसके विदेशी सहयोगियों ने केंद्र सरकार के साथ चल रहे इस बड़े विवाद को आपसी मध्यस्थता (Arbitration) के जरिए सुलझाने का प्रस्ताव रखा है। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ कर रही है।
रिलायंस की मध्यस्थता की पेशकश पर केंद्र का रुख
अदालती कार्यवाही के दौरान रिलायंस और उसके पार्टनर ग्रुप के वकीलों ने पीठ को सूचित किया कि वे बुधवार को ही केंद्र सरकार को औपचारिक पत्र भेजकर मध्यस्थता प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने की अपील करेंगे। कंपनियों ने कोर्ट से गुहार लगाई कि जब तक आपसी बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल जाता, तब तक इस मामले की अदालती सुनवाई को स्थगित रखा जाए। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटारमानी ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि कोर्ट की कार्यवाही जारी रहनी चाहिए। उन्होंने भरोसा दिया कि यदि मध्यस्थता में कोई सकारात्मक प्रगति होती है, तो सरकार कोर्ट को सूचित कर देगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई रोकने से किया इनकार
दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने फिलहाल सुनवाई पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस कदम का स्वागत करते हुए टिप्पणी की, "अगर दोनों पक्ष आपसी सहमति से कोई सफल समाधान निकाल लेते हैं, तो यह बेहद अच्छी बात होगी। ऐसी स्थिति में हम इस मामले का अंतिम निपटारा कर देंगे।" गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट 19 मई से इस मामले पर अंतिम सुनवाई कर रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज, बीपी (BP) एक्सप्लोरेशन और निको लिमिटेड ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जो उनके खिलाफ गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील
यह कानूनी लड़ाई तब सुप्रीम कोर्ट पहुंची जब दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 फरवरी 2025 को अपने एक आदेश में रिलायंस के पक्ष में आए अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट दिया था। इससे पहले हाई कोर्ट के ही एक सिंगल जज बेंच ने अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया था, लेकिन बाद में बड़ी बेंच ने सरकार की अपील पर सिंगल जज के फैसले को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ अब रिलायंस और उसकी सहयोगी कंपनियां देश की शीर्ष अदालत में अपील कर रही हैं।
क्या है अरबों डॉलर का यह पूरा विवाद?
इस विवाद की जड़ें कृष्णा-गोदावरी बेसिन से जुड़ी हैं, जहाँ केंद्र सरकार ने रिलायंस और उसके पार्टनर्स पर आरोप लगाया था कि उन्होंने तय सीमा से बाहर जाकर दूसरे ब्लॉक के गैस भंडारों से प्राकृतिक गैस निकाली, जिसका उन्हें कानूनी अधिकार नहीं था। इस कथित नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने कंपनियों पर 1.55 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 12,000 करोड़ रुपये से अधिक) का जुर्माना ठोका था। हालांकि, जुलाई 2018 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने बहुमत से सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया था और उल्टा सरकार को आदेश दिया था कि वह रिलायंस व अन्य कंपनियों को मुआवजे के तौर पर 8.3 मिलियन डॉलर का भुगतान करे।


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