टाटा ट्रस्ट्स की अहम मीटिंग टली, चैरिटी कमिशर के निर्देश को लेकर विवाद
नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी घरानों में से एक टाटा समूह से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) के ट्रस्टी बोर्ड की शनिवार यानी सोलह मई को होने वाली बेहद महत्वपूर्ण बैठक को अचानक टालना पड़ा है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने इस प्रस्तावित बैठक को स्थगित करने का एक सख्त निर्देश जारी किया था, जिसके पीछे मुख्य वजह ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे और बोर्ड स्ट्रक्चर में नियमों के कथित उल्लंघन की चल रही जांच को बताया गया है। इस औचक फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है, जिसमें मैनेजमेंट ने चैरिटी कमिश्नर के इस कदम को पूरी तरह से एकतरफा करार देते हुए कहा है कि इस मामले में सर रतन टाटा ट्रस्ट को अपनी दलीलें और पक्ष रखने का कोई उचित अवसर प्रदान नहीं किया गया।
देर रात मिले सरकारी आदेश से मची खलबली और नियमों के उल्लंघन का आरोप
टाटा ट्रस्ट्स द्वारा आधिकारिक रूप से साझा किए गए एक बयान के मुताबिक, शुक्रवार की देर शाम उन्हें एक आधिकारिक ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें चैरिटी कमिश्नर ने कात्यायनी अग्रवाल नामक एक शिकायतकर्ता की अर्जी, वेणु श्रीनिवासन के एक प्रतिवेदन और बॉम्बे हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बैठक पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ कात्यायनी अग्रवाल की वह शिकायत है जिसमें आरोप लगाया गया है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट के कुल छह सदस्यों में से तीन सदस्य स्थायी यानी आजीवन ट्रस्टी के तौर पर काम कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की वैधानिक सीमाओं का खुला उल्लंघन है।
नए कानूनी संशोधनों और बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला
इस गंभीर आरोप पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि संबंधित सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम में जो भी बदलाव या संशोधन किए गए हैं, वे एक सितंबर दो हजार पच्चीस से प्रभावी हुए हैं, जबकि ट्रस्ट के भीतर इन स्थायी सदस्यों की नियुक्तियां इस नई कानूनी तारीख से बहुत पहले ही पूरी की जा चुकी थीं। इसके साथ ही ट्रस्ट ने कानून का हवाला देते हुए यह भी दलील दी है कि इसी शिकायत के आधार पर बोर्ड मीटिंग को रोकने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में जो याचिका दायर की गई थी, उसे अदालत ने विगत तेरह मई को ही वापस ली गई मानते हुए पूरी तरह से निस्तारित कर दिया था, ऐसे में चैरिटी कमिश्नर द्वारा बिना कोई पूर्व नोटिस दिए ऐसा एकतरफा आदेश पारित करना न्यायसंगत नहीं है।
बोर्ड की बैठकों पर रोक के पीछे कानूनी अड़चनों और जांच रिपोर्ट का इंतजार
दूसरी तरफ इस प्रशासनिक कार्रवाई पर अपना रुख साफ करते हुए चैरिटी कमिश्नर मोघ एस कलोटी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि ट्रस्ट के इस आंतरिक मामले की जांच के लिए एक विशेष निरीक्षक को नियुक्त किया जा चुका है और वर्तमान में उनकी विस्तृत रिपोर्ट आना अभी बाकी है। कमिश्नर कार्यालय का मानना है कि जब तक यह आधिकारिक जांच पूरी तरह से मुकम्मल नहीं हो जाती, तब तक बोर्ड की कोई भी बैठक आयोजित करना पूरी तरह से अनुचित होगा। विभाग के अनुसार यदि इस संवेदनशील अवधि के दौरान ट्रस्ट के भीतर कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लिया जाता है, तो इससे भविष्य में गंभीर कानूनी पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं और चल रही न्यायिक कार्यवाही में भी बेवजह की देरी होगी।
आजीवन ट्रस्टी की संख्या को लेकर छिड़ी जंग और अरबों के साम्राज्य पर असर
वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था के तहत सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में कुल छह अहम ट्रस्टी शामिल हैं, जिनमें से जिमी नेवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा आजीवन ट्रस्टी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह संख्या मौजूदा बोर्ड की कुल क्षमता के पचास प्रतिशत के बराबर बैठती है, जबकि नए सरकारी नियमों के अनुसार यह वैधानिक सीमा अधिकतम पच्चीस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, जिसके कारण इस पूरे मामले की गहनता से जांच की जा रही है। गौरतलब है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट की पूरे टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस में लगभग तेईस दशमलव छह प्रतिशत की एक बहुत बड़ी हिस्सेदारी है, जिससे इस आंतरिक बोर्ड विवाद और जांच के नतीजों का असर आने वाले समय में देश के कॉर्पोरेट जगत पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।


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